Wednesday, 14 March 2018

गला ख़राब हो या कफ से छाती जाम हो

गला ख़राब हो या कफ से छाती जाम हो ,ये घरेलू उपचार कर देगा आपको पूरा ठीक*_

*भाई राजीव दीक्षित जी*

*गले में कितनी भी ख़राब से ख़राब बीमारी हो, कोई भी इन्फेक्शन हो, इसकी सबसे अच्छी दवा है हल्दी ।
जैसे ...
गले में दर्द है, खरास है , गले में खासी है, गले में कफ जमा है, गले में टोनसीलाईटिस हो गया ;
ये सब बीमारियों में आधा चम्मच कच्ची हल्दी का रस लेना और मुह खोल कर गले में डाल देना , और फिर थोड़ी देर चुप होके बैठ जाना तो ये हल्दी गले में नीचे उतर जाएगी लार के साथ ; और एक खुराक में ही सब बीमारी ठीक होगी दुबारा डालने की जरुरत नही । ये छोटे बच्चों को  जरुर करना ; बच्चों को टोन्सिल जब बहुत तकलीफ देते है न तो हम ऑपरेशन करवाके उनको कटवाते है ; वो करने की जरुरत नही है हल्दी से सब ठीक होता है ।*

*गले और छाती से जुडी हुई कुछ बीमारिया है जैसे खासी ; इसका एक इलाज तो कच्ची हल्दी का रस है जो गले में डालने से तुरंत ठीक हो जाती है चाहे कितनी भी जोर की खासी हो । दूसरी दावा है अदरक , ये जो अदरक है इसका छोटा सा टुकड़ा मुह में रख लो और टाफी की तरह चुसो खासी तुरंत बंद हो जाएगी ।
अगर किसीको खासते खासते चेहरा लाल पड़ गया हो तो अदरक का रस ले लो और उसमे थोड़ा पान का रस मिला लो दोनों एक एक चम्मच और उसमे मिलाना थोड़ा सा गुड या शहद  । अब इसको थोडा गरम करके पी लेना तो जिसको खासते-खासते चेहरा लाल पड़ा है उसकी खासी एक मिनट में बंध हो जाएगी ।
एक अच्छी  दवा है , अनार का रस गर्म करके पियो तो खासी तुरन्त ठीक होती है । काली मिर्च है गोल मिर्च इसको मुह में रख के चबालो , पीछे से गरम पानी पी लो तो खासी बंध हो जाएगी, काली मिर्च को चुसो तो भी खासी बंध हो जाती है ।*

*छाती की कुछ बिमारिया जैसे दमा, अस्थमा, ब्रोंकिओल अस्थमा, इन तीनो बीमारी का सबसे अच्छा दवा है गाय मूत्र ; आधा कप गोमूत्र पियो सबेरे का ताजा ताजा तो दमा ठीक होता है, अस्थमा ठीक होता है, ब्रोंकिओल अस्थमा ठीक होता है । और गोमूत्र पिने से टीबी भी ठीक हो जाता है , लगातार 5..6 महीने पीना पड़ता है ।
दमा अस्थमा का और एक अच्छी दवा है दालचीनी, इसका पाउडर रोज सुबह आधे चम्मच खाली पेट गुड या सेहद मिलाके गरम पानी के साथ लेने से दमा अस्थमा ठीक कर देती है ।

Friday, 9 March 2018

खेचरी मुद्रा

खेचरी मुद्राग्रन्थों में अनेक योग मुद्राओं का वर्णन है। इनमें से एक  मुद्रा है खेचरी।
यह मुद्राओं में सर्वश्रेष्ठ है। इसमें जीभ को मोड़कर, तालु के पीछे ,ऊपर की ओर स्थित विवर में जीभ के अग्र भाग को लगाया जाता है। हमारे ब्रह्मरन्ध्र से एक रस  24 घन्टे टपकता है जिसे अमृत भी कहा जाता है, जो हमारी नाभि में स्थित अग्नि में जाकर नष्ट हो जाता है। 
खेचरी मुद्रा द्वारा इस रस का पान किया जाता है। जो योगी 6 महीने निरन्तर इस मुद्रा  का अभ्यास करता है, वह अपनी इच्छा से शरीर का त्याग करता है। किसी भी विष का प्रभाव उसके शरीर पर नहीं होता। हिंसक जानवर उसको हानि नहीं  पहुचाते। इससे रसानन्द समाधि का लाभ होता है, जो शीघ्र ही सहज समाधि में बदल  जाता है। अनेक विभूतियाँ ऐसे योगी को प्राप्त हो जाती हैं। चलते समय लगता है कि शरीर, जमीन से ऊपर चल रहा है अर्थात् शरीर बहुत हल्का हो जाता है। इस मुद्रा को करने के लिए अनेक गुरु छेदन का उपयोग करते हैं। छेदन में जिह्वा के नीचे स्थित  तन्तु को ब्लेड से हल्का सा काट देते हैं, इसके बाद चालन- दोहन  किया जाता है। छेदन की अपनी हानियाँ भी हैं। कुछ अन्य तरीके भी हैं  जिससे महीने में  ही खेचरी लग जाती है। जब योगी चाहे तब इस मुद्रा  की सहायता से बिन भोजन पानी के भी आराम से रह सकता है।  इस मुद्रा को करने के 2 से 3 घन्टे बाद तक भूख नहीं लगती। ग्रन्थों में  अनेक बातें इस सम्बन्ध में कही गयी हैं, जिनमें से कुछ निम्न हैं ---
●प्रथमं लवण पश्चात् क्षारं क्षीरोपमं ततः। द्राक्षारससमं पश्चात् सुधासारमयं ततः।         
                                     -  (योग रसायनम्)
खेचरी मुद्रा के समय उस रस का स्वाद पहले लवण जैसा, फिर क्षार जैसा, फिर दूध जैसा, फिर द्राक्षारस जैसा और तदुपरान्त अनुपम सुधा, रस-सा अनुभव होता है।
●आदौ लवण क्षारं च ततस्तिक्त कषायकम्। नवनीतं धृत क्षीर दधित क्रम धूनि च। द्राक्षा रसं च पीयूषं जप्यते रसनोदकम। 
                              ---( घरेण्डसंहिता)
खेचरी मुद्रा में जिव्हा को क्रमशः नमक, क्षार, तिक्त, कषाय, नवनीत, धृत, दूध, दही, द्राक्षारस, पीयूष, जल जैसे रसों की अनुभूति होती है।
●अमृतास्वादनाछेहो योगिनो दिव्यतामियात्।      जरारोगविनिर्मुक्तश्चिर जीवति भूतले ।।
                              --- (योग रसायनम्)
भावनात्मक अमृतोपम स्वाद मिलने पर योगी के शरीर में दिव्यता आ जाती है और वह रोग तथा जीर्णता से मुक्त होकर दीर्घकाल तक जीवित रहता है।
एक योग सूत्र में खेचरी मुद्रा से अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति का उल्लेख है-
●तालु मूलोर्ध्वभागे महज्ज्योति विद्यतें तर्द्दशनाद् अणिमादि सिद्धिः।
तालु के ऊर्ध्व भाग में महा ज्योति स्थित है, उसके दर्शन से अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त होती है।
ब्रह्मरन्ध्र साधना की खेचरी मुद्रा प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में शिव संहिता में इस प्रकार उल्लेख मिलता है-
● ब्रह्मरंध्रे मनोदत्वा क्षणार्ध मदि तिष्ठति । सर्व पाप विनिर्युक्त स याति परमाँ गतिम्॥
अस्मिल्लीन मनोयस्य स योगी मयि लीयते। अणिमादि गुणान् भुक्तवा स्वेच्छया पुरुषोत्तमः॥
एतद् रन्ध्रज्ञान मात्रेण मर्त्यः स्सारेऽस्मिन् बल्लभो के भवेत् सः। पपान् जित्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्वा तारयेदद्भुतं वै॥
अर्थात्- 
ब्रह्मरन्ध्र में मन लगाकर खेचरी मुद्रा की साधना करने वाला योगी आत्मनिष्ठ हो जाता है। पाप मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है। इस साधना में मनोलय होने पर साधक ब्रह्मलीन हो जाता है और अणिमा आदि सिद्धियों का अधिकारी बनता है।
●न च मूर्च्छा क्षुधा तृष्णा नैव लस्यं प्रजायते। न च रोगो जरा मृत्युर्देव देहः स जायते॥
                                     --(घेरण्ड सहिंता )
खेचरी मुद्रा की निष्णात देव देह को मूर्च्छा, क्षुधा, तृष्णा, आलस्य, रोग, जरा, मृत्यु का भय नहीं रहता।
●लवण्यं च भवेद्गात्रे समाधि जयिते ध्रुवम। 
कपाल वक्त्र संयोगे रसना रस माप्नुयात।
शरीर सौंदर्यवान बनता है। समाधि का आनन्द मिलता है। रसों की अनुभूति होती है। खेचरी मुद्रा का प्रकार श्रेयस्कर है।
                                                          
                                  ----- ॐ ,शिवोsहम्
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Wednesday, 7 March 2018

अनुलोम-विलोम प्राणायाम


अनुलोम-विलोम प्राणायाम
अन्य नाम
इस प्राणायाम में सांस नासिका की मदद से नियंत्रित की जाती है। यह एकाग्रता और विचारों के उच्च स्तर को पाने में मन को प्रोत्साहित करता है। भौतिक शरीर को अधिक ऊर्जा और ऑक्सीजन देता है और अपने तंत्रिकाओं को शांत और रक्त परिसंचरण में सुधार में मदद करता है।
कैसे करें ??
•अंगूठे के साथ अपने दाहिनी नासिका पकडिये और बाईं नासिका से सांस लीजिए।
•अब अनामिका अंगुली से बाईं नासिका को बंद करो और दाहिनी नासिका खोलिए और सांस बाहर छोडिये। अब दाहिनी नासिका से ही सांस लीजिए।
•फिर बाईं नासिका खोलिए और सांस बाहर छोडिये। जिस नासिका से सांस बाहर छोड़ते हैं उसी से अंदर लेना है |
लाभ:
दिल की समस्याएं, उच्च रक्तचाप, तुला स्नायुबंधन, पक्षाघात, तंत्रिका संबंधित, अवसाद, माइग्रेन, अस्थमा, साइनस, एलर्जी अनुलोम-विलोम से ठीक किया जा सकता है।
सावधानिया:
यदि आप पहली बार ऐसा कर रहे हैं तो यह आराम से और थोडा किया जाना चाहिए।
उच्च रक्तचाप के मरीजों को सांस थामे रखने से बचना चाहिए।

भस्‍त्र‍िका प्राणायाम


भस्‍त्र‍िका प्राणायाम
भस्‍त्र‍िका संस्कृत शब्द भस्‍त्र से बना है, जिसका अर्थ है ‘धौंकनी’ । इस प्राणायाम में, जल्दी‑जल्दीऔर ज़ोर लगाकर अत:श्वसन और उच्‍छ्वसन द्वारा धौंकनी की प्रक्रिया की नकल करते हैं ।
भस्‍त्र‍िका प्राणायाम करें —
प्रारंभिक स्थिति — पदमासन, अर्धपदमासन या किसी भी ध्यानस्‍थ स्थिति में बैठें । शरीर को सीधा रखें ।आरामदायक आसन में सीधे बैठें।
1. अब नासाछिद्रों द्वारा बल लगाकर साँस
अंदर लें और बाहर छोड़ें । दोनों नाक के माध्यम से गहरी श्वास लें और तेजी से साँस छोडें।
2. श्वास पेट के मध्य और निचले भागों के इस्तेमाल से नाक के माध्यम से साँस छोडें।
3. बलपूर्वक साँस लेने और छोड़ने को दस की गिनती तक जारी रखें ।
4. अत में, श्‍वास बाहर छोड़ने के बाद गहरा श्‍वास लें और धीरे‑धीरे श्‍वास छोड़े । यह
भस्‍त्र‍िका प्राणायाम का एक चक्र है ।
निम्नलिखित बिंदुओ को याद रखें —
क्‍या करें क्‍या न करें
• प्रत्येक बार श्‍वास लेते और छोड़ते समय फेफड़ों, डायफ्राम और पेट को गतिशील करें ।
• छाती और कंधे नहीं हिलने चाहिए ।
• अत्यधिक गरम परिस्थितियों में यह अभ्यास न करें ।
लाभ-
• यह भूख में सुधार करता है ।
• यह कफ़ को नष्‍ट करता है ।
• यह अस्थमा में लाभकारी होता है ।
• यह रक्‍त प्रवाह में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के आदान-प्रदान में वदृधि करता है ।
•भस्त्रिका करने से फेफड़ों के लिए भरपूर मात्रा में ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है।
• यह श्वसन प्रणाली के विकारों को हटा देती है | दक्षता में सुधार और चेतना की शुद्धता को बढ़ाती है |
•शरीर में गर्मी पैदा करता है और भूख बढ़ जाती है |
•भस्त्रिका पाचन तंत्र, मधुमेह, साइनस आदि के लिए उपयोगी है |
सीमाएँ(सावधानी-)
• हृदय रोगों, उच्च रक्‍तचाप, चक्कर आना, पेट के अल्सर से पी‍ड़त व्‍यक्‍त‍ियों को इस
प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए ।
•आप धौंकनी की अपनी प्रारंभिक प्रैक्टिस में श्वास बहुत दूर धकेलने के प्रलोभन से बचे |
•इसे अधिक मात्रा में करने से चक्कर आना, उनींदापन जैसी चीजें हो सकती है।

Tuesday, 6 March 2018

कपालभाती प्राणायाम

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कपालभाती प्राणायाम

अन्य नाम:-
कपाल उदय सांस, ललाट मस्तिष्क शोधन, कपालभाती
विवरण:-
कपालभाती दो शब्दों से बना है - कपाल यानि मस्तिष्क/सिर और भाती यानि चमक। यह प्राणायाम मुख्य रूप से मस्तिष्क और मस्तिष्क के तहत अंगों को अच्छी तरह से प्रभावित करता है।
कैसे करें...??
पद्मासन में बैठे |
पेट के निचले हिस्से से हल्का झटका अंदर की ओर दें और सांस नाक से बाहर फेंके | 
फिर पेट ढीला छोड़ दें | फिर हल्के झटके से सांस बाहर फेंके |
इस तरह से लयबद्ध तरीके से करिये |
लाभ:-
*यह आपको स्फूर्तिदायक बनाता है,
*शरीर में गर्मी पैदा करता है |
*बीमारी और एलर्जी से बचाता है।
सावधानी:-
*आम व्यक्ति इसे 50-100 बार कर सकते हैं। इस संख्या में वृद्धि करना उचित नहीं है।
*दिल और फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित मरीजों को विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही यह अभ्यास करना चाहिए।
*रक्त परिसंचरण/ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों को बहुत सावधानी से प्रक्रिया को पूरा करना चाहिए, उन्हें भी विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही यह अभ्यास करना चाहिए।

Monday, 5 March 2018

सुप्त-वज्रासन

सुप्त-वज्रासन
सुप्त का अर्थ होता है सोया हुआ अर्थात वज्रासन की स्थिति में सोया हुआ। इस आसन में पीठ के बल लेटना पड़ता है, इसिलिए इस आसन को सुप्त-वज्रासन कहते है, जबकि वज्रासन बैठकर किया जाता है।
विधि..
दोनों पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाते है, दोनों पैर मिले हुए, हाथ बगल में, कमर सीधी और दृष्टि सामने। अब वज्रासन की स्थिति में बैठ जाते है। वज्रासन में बैठने के बाद दोनों पैरों में पीछे इतना अंतर रखते है कि नितंब जमीन से लग जाए तब धीरे-धीरे दोनों कुहनियों का सहारा लेकर जमीन पर लेट जाते है। 
दाएँ हाथ को पीछे ले जाते है और बाएँ कंधे के नीचे रखते है और बाएँ हाथ को पीछे ले जाकर दाएँ कंधे के नीचे रखते है। इस अवस्था में दोनों हाथों की कैची जैसी स्‍थिति बन जाती है, उसके बाद इसके बीच में सिर को रखते है। वापस पहले वाली अवस्‍था में आने के लिए हाथों को जंघाओं के बगल में रखते है और दोनों कुहनियों की सहायता से उठकर बैठ जाते है।
सावधानी:-
जिनको पेट में वायु विकार, कमर दर्द की शिकायत हो उन्हें यह आसन नहीं करना चाहिए। इसे खाना खाने के तुरंत बाद न करें। 
नितंब मिलने के बाद ही जमीन पर लेटे। लेटते समय जितनी आसानी से जा सकते है, उतना ही जाए। प्रारंभ में घुटने मिलाकर रखने में कठिनाई हो तो अलग-अलग रख सकते है, धीरे अभ्यास करने पर पैर को मिलाने का प्रयास करें। जमीन पर लेटते समय घुटने उपर नहीं उठने चाहिए, पूर्ण रूप से जमीन पर रखें।
लाभ:-
यह आसन घुटने, वक्षस्थल और मेरुदंड के लिए लाभदायक है।
उक्त आसन से उदर में खिंचाव होता है, इस खिंचाव के कारण उदर संबंधी नाडि़यों में रक्त प्रावाहित होकर उन्हें सशक्त बनाता है। 
इससे उदर संबंधी सभी तरह के रोगों में लाभ मिलता है। 
साथ ही पेट की चर्बी भी घटती है।

Friday, 16 February 2018

मानसिक रोग क्या है?

मानसिक रोग क्या है?
विशेषज्ञों का कहना है कि जब एक व्यक्‍ति ठीक से सोच नहीं पाता, उसका अपनी भावनाओं और व्यवहार पर काबू नहीं रहता, तो ऐसी हालत को मानसिक रोग कहते हैं। मानसिक रोगी आसानी से दूसरों को समझ नहीं पाता और उसे रोज़मर्रा के काम ठीक से करने में मुश्किल होती है।
रोग होने के कारण:
इस रोग के होने का सबसे प्रमुख कारण गलत तरीके का खान-पान है। शरीर में दूषित द्रव्य जमा हो जाने के कारण मस्तिष्क के स्नायु में विकृति उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण मस्तिष्क के स्नायु अपना कार्य करना बंद कर देते हैं और मानसिक रोग हो जाता है।
शरीर के खून में अधिक अम्लता हो जाने के कारण भी यह रोग हो सकता हैं क्योंकि अम्लता के कारण मस्तिष्क (नाड़ियों में सूजन) में सूजन आ जाती है जिसके कारण मस्तिष्क शरीर के किसी भाग पर नियंत्रण नहीं रख पाता है और उसे मानसिक रोग हो जाता है।
अधिक चिंता, सोच-विचार करने, मानसिक कारण, गृह कलेश, लड़ाई-झगड़े तथा तनाव के कारण भी मस्तिष्क की नाड़ियों में रोग उत्पन्न हो जाता है और व्यक्ति को पागलपन का रोग हो जाता है।
अधिक मेहनत का कार्य करने, आराम न करने, थकावट, नींद पूरी न लेने, जननेन्द्रियों की थकावट, अनुचित ढ़ग से यौनक्रिया करना, आंखों पर अधिक जोर देना, शल्यक्रिया के द्वारा शरीर के किसी अंग को निकाल देने के कारण भी मानसिक रोग हो सकता है।
यह रोग पेट में अधिक कब्ज बनने के कारण भी हो सकता है क्योंकि कब्ज के कारण आंतों में मल सड़ने लगता है जिसके कारण दिमाग में गर्मी चढ़ जाती है और मानसिक रोग हो जाता है।
लक्षण :
मानसिक रोग के लक्षण, हर व्यक्‍ति में अलग-अलग हो सकते हैं। ये इस बात पर निर्भर करते हैं कि उसके हालात कैसे हैं और उसे कौन-सी मानसिक बीमारी है। कुछ लोगों में इसके लक्षण लंबे समय तक रहते हैं और साफ नज़र आते हैं, जबकि कुछ लोगों में शायद थोड़े समय के लिए हों और साफ नज़र न आएँ। मानसिक रोग किसी को भी हो सकता है, फिर चाहे वह आदमी हो या औरत, जवान हो या बुज़ुर्ग, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, या चाहे वह किसी भी संस्कृति, जाति, धर्म, या तबके का हो। किसी को मानसिक रोग होने का कारण यह नहीं कि उसमें कोई दोष है। अगर मानसिक रोगी अच्छी तरह अपना इलाज करवाए, तो वह ठीक हो सकता है। वह एक अच्छी और खुशहाल ज़िंदगी जी सकता है।